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बुधवार, 23 मार्च 2011

आर्य आक्रमण की कल्पना -- मात्र एक कुटिल कल्पना

आर्य जाती और आर्यों का आक्रमण है एक मिथक जिसे अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ और अपनी काल्पनिक श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए और आज कुछ लोग अपने छुद्र निजी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उस असत्य का प्रयोग कर रहे हैं और अपने निजी स्वार्थों के लिए उस कल्पना को जीवित रखना चाहते हैं जिसके पक्ष में कोई भी प्रमाण नहीं है | कोई भी ऐसा प्रमाण नहीं है जिसे आर्य नमक जाती , आर्यों का आक्रमण भारोपीय भाषा या किसी भी ऐसी कल्पना का अस्तित्व सिद्ध होता हो |

आर्य आक्रमण सिद्धांत की सबसे पहली कल्पना ये कहती है की सिन्धु घटी सभ्यता आर्यों से पहले की सभ्यता है आर्यों 1500 ईसा पूर्व उसे आक्रमण करके नष्ट कर दिया था परन्तु आर्यों के इस काल्पनिक आक्रमण के काल और सिन्धु घाटी सभ्यता (जो की वास्तव में सिन्धु सरस्वती सभ्यता है) के अंत के बीच में 250 वर्षों का अंतर है |

रविवार, 6 मार्च 2011

महात्मा गांधी : अहिंसा का पुजारी या 1919 के हिन्दुओं के नरसंघार का नेतृत्वकर्ता

नकली महात्मा का असली चेहरा


मोहनदास करमचन्द्र गाँधी (कुछ के लिए महात्मा ) , उसे आधिकारिक रूप से तो भारत का राष्ट्रपिता कहा जाता है परन्तु उस व्यक्ति ने भारत की कितनी और किस तरह से सेवा की थी इस सम्बन्ध में लोग चर्चा करने से भी डरते हैं | गांधी के अनुयायी गांधी का असली चेहरा देखना ही नहीं चाहते हैं क्यूँकी वो इतना ज्यादा भयानक है उसे देखने के लिए गांधीवादियों को सहस जुटाना होगा | सभी गांधीवादी , महात्मा गांधी (??) को अहिंसा का पुजारी मानते हैं जिसने कभी भी किसी तरह की हिंसा नहीं की परन्तु वास्तविकता तो यह है की बीसवी सदी के सबसे पहले हिन्दुओं के नरसंघार का नेतृत्व इसी मोहनदास करमचन्द्र गांधी ने किया था |

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

कश्मीर के विस्थापित हिन्दू

21 साल बाद भी घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के दर्द पर मुफीद मरहम नहीं रखा जा सका है.
जन्मभूमि किसे प्यारी नहीं होती. लेकिन जबरन जन्मभूमि छोड़नी पड़े, इससे बड़ा दर्द शायद ही कोई हो. आतंक की वजह से कश्मीरी पंडित विस्थापित तो जरूर हो गए लेकिन उन्हें अपने घर की याद अब भी सताती है. विस्थापित कश्मीरी पंडितों का वह दर्द 21 वर्षों बाद आज भी जिंदा है और वह अपने घर लौटना चाहते हैं.
पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा
19 जनवरी 1990 यानी 21 साल पहले आज ही के दिन कश्मीर की घाटी में बसने वाले तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों के परिवार को सीमा पार के आतंकवादियों की साजिश के चलते जबरन अपना घर-बार छोड़कर रातों रात भागना पड़ा था.
19 और 20 जनवरी 1990 की रात जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में पाकिस्तान की शह पर भेजे गए आतंकवादियों और कुछ स्थानीय नागरिकों की मिलीभगत से कश्मीर की घाटी में हजारों साल से बस रहे एक खास समुदाय को जल्द से जल्द घाटी में अपना घर-बार छोड़कर भाग जाने का फरमान सुना दिया गया. रात भर चली नारे बाजी और कत्लेआम इतना खौफनाक था कि जिसे जैसे ही मौका मिला और जो जिस हालत में था उसी में वहां से भाग निकला.
इसके चलते एक रात में कश्मीर की घाटी में बसने वाले तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों को अपनी मिट्टी, अपना घर, पैसा, सोना-चांदी, अपना व्यापार सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा था.
कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ हमारे सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कश्मीरी पंडितों के पलायन करवाने में पाकिस्तान की साजिश थी. वह कश्मीर के कई इलाकों से ऐसे लोगों को हटाना चाहता था जो उसके लिए रुकावट पैदा कर सकते थे. उसने आपस में फूट कराई और कई इलाकों में दंगे भी करवाए.
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान ने एक योजना बनाकर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया और कश्मीरी पंडितों को पलायन करने के लिए मजबूर किया. लेकिन जानकारों का यह भी मानना है कि सब जानते हुए भी सरकार कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा नहीं दे पाई. यह हमारी सरकार की असफलता थी.
कश्मीरी पंडितों का मानना है कि उन्हें गिला पाकिस्तान और आतंकवादियों के साथ-साथ अपनी सरकार से भी है. क्योंकि संकट के समय इन लोगों के साथ न तो केंद्र सरकार खड़ी हुई और न ही राज्यसरकार.
कश्मीर की समस्या चाहे जब खत्म हो लेकिन कश्मीर की जमीन से जुदा लोगों की उम्मीद हर एक दिन हर एक नई सुबह के साथ शुरू होती है. लेकिन एक कभी न खत्म होने वाले इंतजार के साथ हर दिन चलती जाती है.

मंगलवार, 1 मार्च 2011

मैकाले का षड्यंत्र : भारतीयता की हत्या

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मैकाले का षड्यंत्र : भारतीयता की हत्या
by Ankit Therealscholar on 01 मार्च 2011 को 09:39 बजे

कुछ लोगों का मानना है की हमें लार्ड मैकाले का आभारी होना चाहिए की उसने भारत को आधुनिक शिक्षा प्रणाली (?) दी थी ,, हाँ मैकाले ने एक शिक्षा प्रणाली अवश्य दी थी परन्तु ऊस कथित शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भारत और हिंदुत्व की आत्मा की हत्या था | यह एक षष्ट था भारत और भारतीयता की जड़ों पर प्रहार का | इस प्रणाली की स्थापना के पीछे मैकाले की मूल भावना क्या थी इस बात को दिखने के लिए मैं मैं काले के द्वारा उसके पिता को दिनांक 12 - 10 -1836 को लिखे गए पात्र का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ

"हमारे अंगरेजी विद्यालय आश्चर्यजनक ढंग से प्रशस्त हो रहे हैं | हिन्दुओं पर इनकी शिक्षा का अद्भुत प्रभाव पड़ रहा है | कोई भी हिन्दू , जिसने अंगरेजी शिक्षा पायी हो , अपने धर्म के प्रति निष्ठावान नहीं रहता | इनमे से कुछ और्प्चारिक्तावश हिन्दू बने रहते हैं तो कुछ इसाई बन जाते हिं | मेरा द्रिड विशवास है की यदि हमारी शिक्षा योजना इसी तरह जारी रही तो आगामी तीस वर्षों में बंगाल के संभ्रांत हिन्दू परिवारों में एक भी मूर्तिपूजक बाकी नहीं बचेगा | यह धर्मान्तरण की प्रक्रिया बिना प्रयत्न किये , बिना धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किये , स्वाभाविक ढंग से स्वतः पूर्ण हो जाएगी | मुझे इस योजना से बड़ी खुशी हो रही है |"(सन्दर्भ "aryans who were they ?" लेखक श्री राम साठे)

भले ही मैकाले की आशाअनुरूप सफलता न मिली हो इस षड्यंत्र को परन्तु इस पात्र के इस शिक्षा प्रणाली का मूल लक्ष्य आसानी से समझा जा सकता है और यह शिक्षा प्रणाली करक है बहुत सी समस्याओं की क्योंकी इसके उत्पादों में से बहुत से यह मानते हैं की जो कुछ भारतीय है वो ख़राब अहि निकृष्ट है और भारत के पास तथा भारतीय संस्कृति के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके | वो लोग स्वयं को भारतीय के स्थान पर इन्डियन कहलाना पसंद करते हैं और प्रेरणा के लिए विदेशों की तरफ देखते हैं | ये एक वैचारिक युद्ध की तरह है जिसमे की हमें संघर्ष की आवश्यकता है क्यूँकी अगर इस युद्ध में हम पराजित हो गए तो इस पराजय का अर्थ होगा भारतीयता और भारत की पराजय |

वन्दे मातरम |