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सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

हमें क्यूँ नहीं चाहिए हिन्दू मुस्लिम एकता

हमें हिन्दू मुस्लिम एकता नहीं चाहिए है और हिन्दू - मुस्लिम एकता हमारे लिए अनावश्यक ही नहीं अपितु अवांछनीय भी है क्यूँकी जब जब भी हिन्दू मुस्लिम एकता जैसी बातें की गयी हैं तब तब हिन्दुओं के छल हुआ है | हर वह युद्ध जो हिन्दू और मुस्लिमों ने साथ साथ मिलकर (कथित रूप से ) लड़ा है उसमे बलिदाल केवल और केवल हिन्दुओं ने दिया है और यदि कोई लाभ हुआ है  तो वो मुस्लिमों का हुआ है |

 भारत में पहला मुस्लिम आक्रमण 712 में सिंध के रजा दाहिर पर हुआ था और उसके बाद लगभग 1100 वर्षों तक भारत में में केवल हिन्दू और मुस्लिम दो ही शक्तियां थीं और इनके बीच लगातार संघर्ष चलता रहा था इसलिए "हिन्दू -मुस्लिम"एकता जैसा कोई भी भ्रम फैलाने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई मुस्लिमों को परन्तु अंग्रेजों के आने के बाद पहली बार मुसलमानों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिन्दुओं की सहायता की आवश्यकता अनुभूत हुई और उस समय मुस्लिमों ने पहली बार इस लुभावने चल का प्रयोग किया था | यह एक कटु सत्य है और सिद्ध भी किया जा सकता है  की 1857 में हिन्दू तो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए विदेशियों से लड़ रहे थे परन्तु मुस्लमान केवल इस्लाम के लिए काफिरों से
लड़ रहे थे और काफिर की संज्ञा में केवल अंग्रेज ही नहीं हिन्दू भी थे | इसीलिए पुरे विश्व के इतिहास की इस सबसे ज्यादा रक्तिम क्रांति में वीरगति को प्राप्त होने वाले अधिकांश हिन्दू ही थे | सबसे पहले मुसलमानों ने इस सुनियोजित क्रांति को ३० मई के निर्धारित समय से २० दिन पहले ही शुरू करवा दिया ताकि विजय मिलने की स्थिति में राज्य मुस्लिमों के हाँथ में रहे |इसके लिए उन्होंने पुरे मेरठ में पोस्टर लगवाये की "......हर मुस्लमान का ये फर्ज है की वो जिहाद करे और काफिरों को मार भगाय ...." | इन पोस्टरों में मुसलमानों का जेहाद के लिए आवाहन किया गया था न की भारतीयों का स्वतंत्रता के लिए |इसके बाद भी जब मेरठ छावनी के सैनिक जिसमे से की अधिकांश हिन्दू थे निर्धारित समय से पहले क्रांति करने को तैयार नहीं हुए तो मुसलमानों ने मेरठ सदर बाजार के अन्दर स्वयं ही अंग्रेजों की हत्याएं प्रारंभ कर दीं और इस प्रकार की अफवाहें फैलानी प्रारंभ कर दी की यूरोपियन सेना छावनी में घुस रही है | बाध्य होकर उसके बाद मेरठ छावनी के सैनिकों को सुगठित योजना से बहार निकल कर २० दिन पहले ही क्रांति प्रारंभ करनी पडी |

इसके बाद जब क्रांतिकारियों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया तो बहादुरशाह जफ़र के मंत्री ने उसे सूचना देते हुए कहा ".. हमने दिल्ली से सभी अंग्रेजों को भगा दिया है और अब हम जल्दी ही हम हिन्दुओं को भी ख़तम कर देंगे ...."| दिल्ली पर बहादुरशाह जफ़र का कब्ज़ा होते ही पुरे पंजाब में बहादुर शाह जफ़र की तरफ से पोस्टर में लगवाये गए जिसमे की मुसलमानों से ये आवाहन किया गया था की "महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में सिंखों के हाथों वहाबी मुस्लिमों की हुई पराजय का प्रतोशोध ले लें क्यूँ की हिन्दुस्तान में पुनः इस्लामिक हुकूमत आ गयी है |" इसके बाद बाध्य होकर पटियाला के महाराजा को अंग्रेजों की सक्रीय सहायता करनी पडी जिसने की अंग्रेजों के लिए संजीविनी का काम किया और प्रतिउपकार में अंग्रेजों ने बहादुरशाहजफ़र के बेटों को मार कर उन्ही स्थानों पर रखा जहाँ की  सिख गुरुओं की हत्या की गयी थी |

इसके अतिरिक्त जिस समय में दिल्ली पर मुगर बादशाह का राज्य था उस समय दिल्ली के मुस्लमान बड़े पैमाने पर ईद के उत्सव की तैयारी कर रहे थे जिसमे  की  वो सड़कों पर गाय को काट कर ईद और इस्लामिक हुकूमत के वापस आने की खुशियाँ मानना चाहते थे | उनकी इन तैयारियों ने बहुत से हिन्दुओं को अंग्रेजों का साथ देने पर बाध्य कर दिया था |

केवल दिल्ली ही नहीं अयोध्याया में भी 1857 में ही मुसलमानों के जिहाद की घोषणा कर के हनुमंघधि पर आक्रमण कर दिया था | यद्यपि यह आक्रमण असफल हो गया परन्तु इसके बाद वहां के लोग कैसे हिन्दू - मुस्लिम एकता जैसे शब्दोंमे विशवास कर सकते थे ??
वाराणसी में भी जब अंग्रेज सिख रेजिमेंट की सहायता से एक भारतीय सेना को निशस्त्र कर की उनकी हत्या कर रहे थे तो यह द्रश्य देख कर सिख घुड़सवार सेना ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था और वाराणसी में अंग्रेजों को हिन्दू-सिख सैनिक तथा स्थानीय जनता  तीनो  से लड़ना पड़ा था परन्तु मुसलमानों ने अपना असली चेहरा दिखाते हुए काशी-विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण करके उसको तोड़ने का प्रयास किया जिसके बाद स्थानीय राजपूतों को बाध्य होकर मंदिर की रक्षा के लिए अंग्रेजों का साथ देना पड़ा |

इस भाँती मुसलमानों के बार बार के विश्वासघात के कारन इतिहास की सबसे रक्तिम क्रांति में लाखों हिन्दुओं का रक्त बहा और कुछ समय के लिए ही ; परन्तु राज्य एक मुस्लिम बहादुर शाह जफ़र को मिला |

इसके बाद दूसरी बार इस "हिन्दू मुस्लिम एकता " के छल का प्रयोग 1919 में किया गया और नाम दिया गया "खिलाफत आन्दोलन" | यह एक विशुद्ध इस्लामिक और हिंसक आन्दोलन था और हिन्दुओं को इसमें भाग लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी परन्तु  M . K . गाँधी ने पुनः 'हिन्दू मुस्लिम एकता '  के भ्रम को फैलाया , पुनः सामने अंग्रेज थे परतु मुस्लिमों के लिए तो काफ़िर केवल काफ़िर होते हैं फिर वो चाहें हिन्दू हों अंग्रेज और इसीलिए इस आन्दोलन में मुस्लिमों का साथ देने के बदले में हिन्दुओं को मोपला नर्संघर जैसे उपहार मिले |मोपला में हुस्लिमों ने वही किया जो की शायद वो 1857 में करना चाहते थे परन्तु अंग्रेजों की विजय के कारन नहीं कर पाय परन्तु 1919 में मोपला से अंग्रेजों के पलायन के बाद वो सब मुस्लिमों ने किया जो की दारुल इस्लाम बनाने क एलिए आवश्यक था |

तीसरी बार पुनः M K गाँधी के कारन 1942 में हिन्दू मुस्लिम एकता का मूर्खतापूर्ण प्रयास हुआ जिस आन्दोलन में मुस्लिमों ने कोई प्रतिभाग नहीं किया और इस बंधुत्व के बदले हिन्दुओं को सीढ़ी कार्यवाई भारत का विभाजन मिला और मुस्लिमों की 23 % जनसँख्या को भारत के 40 % संसाधन मिले उसके बाद भी सारे मुस्लिम पकिस्तान नहीं गए क्यूँकी M K गाँधी  का मुर्खतापूर्ण 'हिन्दू मुस्लिम एकता ' प्रलाप चालू था |

इस भ्रामक नारे का एक और प्रयोग 1971 में देखा गया बांग्लादेश या तत्कालीन पूर्वी पकिस्तान में जबकी बंगला मुस्लिमों ने यह छल किया हिन्दू - मुस्लिम का भेद भुलाकर हमें बंगला संस्कृति के लिए संघर्ष करना चाहिए और इस बार भी मरने वाले औअर संघर्ष करने वाले हिन्दू ही थे , पलायित होकर भारत आने वाले भी हिन्दू ही थे और इस संघर्ष के बाद मिला एक और इस्लामिक राष्ट्र बंगलादेश जहाँ की आज हिन्दू अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं |

इस सब के अतिरिक्त एक अपवाद भी है | 1905 जब बंग-भंग हुआ था उस समय के अंग्रेज शासकों ने 'पूर्वी बंगाल ' के मुस्लिमों को यह समझा दिया था की पूर्वी बंगाल में मुस्लिमों का बहुसंख्य में होना कैसे उनके हित में होगा परन्तु उस समय पुरे भारत ने उस विभाजन का विरोध किया था और उस समय मुस्लिमों को साथ लेने की कोई जिद या 'हिन्दू मुस्लिम एकता' का कोई नारा नहीं था और परिणाम स्वरुप अंग्रेज सरकार को झुककर बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा था |

इतिहास साक्षी है की 'हिन्दू-मुस्लिम ' एकता जैसी कोई भी चीज हो ही नहीं सकती है और  मुस्लिमों से एकता का प्रयास करना स्वयं की हत्या करने के सामान होगा और इसीलिए हम न तो हिन्दू मुस्लिम एकता जैसे किसी भी विचार का समर्थन करते हैं और न इसे व्यावहारिक मानते हैं | हमारा हमारी इतिहास की समझ तो यह कहती है की हिन्दू मुस्लिम एकता अनावश्यक ही नहीं अवन्क्षनीय भी है |

3 टिप्‍पणियां:

  1. देखिए यह लेख बहुत ही सधे हुए भाव से लिखा गया है इसलिए प्रशंसा की टिप्पणी करना आवश्यक है साथ ही यह निवेदन है कि हम जब ऐतिहासिक घटनाओं के संदर्भ में लिखें तो संबंधित संदर्भ भी देवें जिससे पाठकों को तथ्य पर विश्वास करना पड़े।

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    1. प्रशंशा के लिए धन्यवाद ; इस लेख में मैंने वही बातें लिखी है वो की साधारन्तायाह सत्य ही मानी जाती हैं ; हां 1857 से सम्बंधित कुछ नयी बातें अवश्य है परन्तु मैं जल्दी ही उस बिंदु पर एक लेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ ; वह लेख पूरी तरह सन्दर्भों से युक्त होगा तथा उससे यह सिद्ध हो सकेगा की 1857 में भारत की पराजय मुस्लिमों के द्वारा धोखा देने के कारन ही हुई थी

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  2. प्रिय अंकित भाई जी आपने इतिहास की बहुत ही कडवी सच्चाई को सरल व सार्थक शब्दों में अभिव्यक्त किया है ... आभार आपका ।
    हमारा मुगलकालीन संघर्ष का इतिहास इसी बात को चीख - चीख कर कह रहा है, परन्तु हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है ।

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