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गुरुवार, 1 सितंबर 2011

ज्ञान , धन और समाज के लिए ज्ञान का महत्त्व

ज्ञान के लिए धन की आवश्यकता के दुष्प्रभाव

अगर कोई मुझसे पूछेगा की COPYRIGHT की हिंदी क्या होती है तो मेरा सीधा उत्तर होगा की COPYRIGHT की कोई हिन्दी नहीं होती है क्यूँकी हमारी संस्कृति में copyright नहीं होता है हमारी संस्कृति में ज्ञान का प्रवाह मुक्त होता है और यह केवल एक ही क्षेत्र नहीं है जहाँ पर ज्ञान का मुक्त प्रवाह होता है | हमारे मनीषियों ने ज्ञान के महत्त्व को भी समझा था और उसकी शक्ती को भी और इसलिए उनको पता था की ज्ञान पर धन का नियंत्रण नहीं होना चाहिए अपितु नैतिकता का और प्राणीमात्र के कल्याण की भावना का नियंत्रण होना चाहिए |

परन्तु आज की स्थिति यह है की शिक्षा की प्राप्ति के लिए पहली आवश्यकता धन हो गयी है धन के बिना शिक्षा प्राप्त करना संभव ही नहीं रह गया है और इसके परिणाम भी भयंकर हुए हैं | जब शिक्षा धन की सहायता से ही मिलाती है (और एक सीमा तक केवल धन की सहायता से) तो शिक्षा का उद्देश्य भी धनोपार्जन ही रह जाता है | हमने अपने विद्यालयों में वाक्य लिखे देखे थे "शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइए " परन्तु आज की वास्तविकता है की "धन की सहायता से आइये और धनोपार्जन के लिए जाइए " और
यह समाज के लिए त्रासदी कारक क्योंकी पूरे शिक्षा काल में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों का ध्यान पुरी तरह से इस बात पर लगा रहता है की किस तरह से अधिक विद्यार्थी अधिक से अधिक धनोपार्जन के योग्य बन सकता है ज्ञान तो कहीं पीछे छूत जाता है |

यह सब भी उतना विडम्बनापूर्ण नहीं होता अगर यह स्थिति केवल व्यक्तिगत स्तर पर होती , परतु यह सब संस्थाओं के स्तर पर भी हो रहा है , वो संस्थान श्रेष्ठ माने जाते हैं जहाँ के छात्र अधिक धनोपार्जन कर सकते हैं और इसका परिणाम यह होता है हमारे सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों की नीतियों को भी बड़े उद्योगपति नियंत्रित करने लगते हैं | अब जब धन का ज्ञान पर इस स्तर से नियंत्रण होगा तो उसका उपयोग भी कुछ लोगों के व्यक्तिगत हितों के लिए होगा और ऐसा हो भी रहा है | हम अप को इसके कुछ उदहारण बताते हैं |

हमारे कुछ अतिप्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थान हैं जिनको अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिलाता है और इन संस्थानों में कई महत्वपूर्ण आविष्कार भी हुए हैं परन्तु वो सारे आविष्कार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बड़े उद्योगों या उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाने वाले हैं |भारतीय प्रद्योगिकी संस्थान दिल्ली में मेकेनिकल अभियांत्रकी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष के अबुसार पिछले ३० वर्षों में किसी भी भारतीय प्रद्योगिकी संस्थान में "वैकल्पिक उर्जा "पर कोई सार्थक कार्य नहीं हुआ है | एक निकाय है "गैसीफायर" अगर यह पूरी तरह से विकसित हो जाय तो शहरी क्षेत्रों में भी बहुत ही काम लकड़ी से शहरी क्षेत्रों में भी खाना बनाया जा सकता हैं परन्तु इस प्रकार के उपकरण का अभी तक विकास हुआ ही नहीं है क्योंकी इनके विकास मी किसी भी बड़े उद्योग के हित निहीत नहीं थे और शायद किसी सीमा तक अहित भी हो सकता था |इस सब के स्थान पर पर्यावरण की रक्षा के नाम पर विकसित हुए हैं वो उपकरण जो बिजली से चलते हैं परन्तु ये बात छिपाई जाती है की विद्दुत के उत्पादन में भी प्रदूषण उत्पन्न होता है या विकसित होते हैं वो सौर्य उर्जा उपकरण जो अपने पुरे जीवन काल में भी उतनी उर्या का उत्पादन नहीं कर पाते हैं जितनी उर्जा उन उपकरणों के उत्पादन में व्यय हुई थी |

शिक्षा के लिए धन की आवश्यकता की हानियाँ केवल इतनी ही नहीं हैं | यदि ज्ञान धन की सहायता से प्राप्त किया गया है तो उसे निःशुल्क सेवा में नहीं लगाया जा सकता है और इस कारण से जो निर्धन हैं वो ज्ञान की सेवाओं से वंचित रह जाते हैं | हमारे ग्रंथों में ज्ञान जीवियों को ब्राहमण कहा गया है और स्पष्ट आदेश दिया गया है की "अपनी सेवाओं का मूल्य लेना कुत्ते की वृत्ति है जो की ब्राहमणों के लिए आपत्ति काल में भी वर्जित है |" परन्तु यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार की पूरी संचित संपत्ति लगाकर या ऋण लेकर शिक्षा और योग्यता प्राप्त करता है तो हम उससे यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं की वो इस ज्ञान को निःस्वार्थ और निःशुल्क सेवा में लगाएगा ??? और ज्ञान को बेचे जाने के परिणाम भयावह होते हैं यह सब हम आज के इस तथाकथित विकास चक्र को देख कर समझ सकते हैं |

तो क्या हमें एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है जिसमे की ज्ञान का प्रवाह मुक्त हो , क्या हमें एक ऐसी व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए जहाँ किसी भी स्तर पर ज्ञान या ज्ञान आधारित सेवाओं के लिए किसी भी स्तर पर धन ना देना पड़े ? जिस व्यवस्था में ज्ञान का उद्देश्य धनोपार्जन नहीं अपीति सर्वे भवन्तु सुखिनः हो ?? अगर हम ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर सकें तो शायद हम एक ऐसे समाज का भी निर्माण कर पाएंगे जहाँ पर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य धन तथा भौतिक संसाधनों का उपार्जन ना होकर उससे कुछ अधिक होगा औ ज्ञान का उद्देश्य धन नहीं अपितु प्राणिमात्र के कल्याण की भावना होगी |

8 टिप्‍पणियां:

  1. bilkul sahi, hame to apni sanskrit ka bhi palan karne ki izazat nahi, kaisa durbhagya hai

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की लगाई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. बिलकुल उचित तर्क दिए है ! आज - कल शिक्षा अर्थोपार्जन तक सिमित हो गया है !

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  4. बाबू पैदा करने के लिए भारत में जो अर्थप्रधान शिक्षा नीति लार्ड मैकाले ने शुरू की थी , उसे सत्ता हस्तांतरण होने के बाद नेहरू सरकार ने पर ज्यो तो त्यो लागू रखा । जिसके कारण शिक्षा तो बढ़ी लेकिन संस्कार का अभाव हो गया ।
    सुन्दर , प्रेरक रचना ...... आभार ।

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  5. प्र-चल |
    स्तभ: ||

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    मेरी बधाई स्वीकार करें ||

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  6. पञ्च दिवसीय दीपोत्सव पर आप को हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर आपको और आपके कुटुंब को संपन्न व स्वस्थ रखें !
    ***************************************************

    "आइये प्रदुषण मुक्त दिवाली मनाएं, पटाखे ना चलायें"

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आप जैसे चाहें विचार रख सकते हैं बस गालियाँ नहीं शालीनता से