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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

वेलेनटाइन संत : असंत और बसंत

अभी लगभग १ महीने पहले तक सभी स्थानों पर नववर्ष की धूम थी | सारी मीडिया में भी और सभी बाजारों में भी परन्तु उसके बाद मकर संक्रांति शांति से निकल गया किसी को पता भी नहीं चला ; उसके बाद वसंतोत्सव जो की भारतीय मदनोत्सव है वो भी चला गया किसी को पता नहीं चला परन्तु  "वैलेंटाइन डे"  का शोर  अभी से सुनायी देने लगा है |ऐसा क्यूँ होता है की भारतीय पर्व तो शांति से निकल जाते हैं परन्तु पश्चिमी तोहारों की गूँज बहुत देर तक सुनायी देती है |मेरे अनुसार इसका कारण यही है की हर पश्चिमी उत्सव का एक मात्र अर्थ होता है खर्च करना जो की बाजार और बाजार की शक्तियों को पसंद आता है जबकी भारतीय त्योहारों में सादगी होती है जो की बाजार को पसंद नहीं आती है |

सबसे पहले तो बात कर लेते हैं "संत वैलेंटाइन " की की आखिर उन्होंने ऐसा किया क्या था | आप किसी भी "वैलेंटाइन डे " समर्थक से पूछेंगे तो वो यही कहेगा की एक संत थे वैलेंटाइन नाम के जिन्होंने ७ लोगों की शादी करवा दी थी |बात बिलकुल सही है परन्तु आखिर शादी करना इतनी बड़ी बात क्यूँ हो गयी ?? इसका उत्तर है बाइबिल जिसमे की स्पस्ट शब्दों में लिखा हिया की GOD ने अदम के मनोरंजन के लिए उसकी रीढ़ की हड्डी से इव को बनाया था
और यही पाश्चात्य संस्कृति रही है और इसका पालन करने के कारण ही उनके देश में विवाह की परंपरा नहीं रही है | जबकी भारत के तो प्राचीन काल से ही अर्धनारीश्वर की कल्पना की है |तो वैलेंटाइन नाम के उस व्यक्ति ने एक प्रयास किया था उस समय के पाश्चात्य समाज को "अडम के रीढ़ की हड्डी से बनी इव" के अवधारणा से हटा कर "अर्धनारीश्वर" के अवधारणा  की तरफ ले जाने का परन्तु यह प्रयास न तो उस समय के ईसाई धर्म को पसंद आया और न ही वहां के धार्मिक शासक क्लौदियास को और इसी लिए उस वैलेंटाइन के हत्या कर दी गयी | एक और महत्वपूर्ण बात ये है की वैलेंटाइन को संत उसके मरने के 400 वर्ष बाद तक भी नहीं माना गया था और यह तथ्य स्वयं चर्च के ही दस्तावेज कहते हैं |

अब बात कर लीजिये आज के इस वैलेंटाइन डे की ; सबसे बड़ी बात जब संत वैलेंटाइन को फांसी 14 फरवरी को दी गयी थी तो ये उत्सव २० दिनों का क्यूँ ?? दूसरी बात  किसी  संत की प्पुन्य तिथि उत्सव क्यूँ ?? अगर मदनोत्सव ही मानना है तो वसंत पंचमी है न ? इसका सीधा अर्थ है की ये उत्सव प्रेम का उत्सव नहीं अपितु बाजार का उत्सव है और कोई भी भारतीय उत्साव बाजार के हितों के अनुरूप हो ही नहीं सकता है |आज तो संत वैलेंटाइन के नाम पर असंतों का कब्ज़ा हो गया है जिनके अनुसार हर उत्साव का अर्थ केवल खर्च करना है और इसी लिए इस उत्सव की अवधि भी २० दिनों की हो चुकी है और बाजार ने नए नए नियम भी बना दिए हैं |जैसे की आप को हर साल नयी /नया गर्लफ्रेंड या बोय्फ़्रिएन्द चाहिए होगा |उसके बाद आप हो उसे सभी २० दिनों तक अच्छे अर्थात महंगे उपहार देने होंगे | आप के प्रेम की सच्चाई उपहारों के कीमत के आधार पर तय होगी | और इक्केसवें दिन के बाद से प्रेम का कोई अर्थ नहीं | तो अब आप को ये सोचना चाहिए की ये उत्सव संत का है या असंतों का ?? संत वैलेंटाइन ने उस समाज को जिस दिशा में चलने की कोशिश की थी हम उसी दिशा में जा रहे हैं या उसकी उल्टी दिशा में ?? हम संत वैलेंटाइन के अनुयायी हैं या असंत क्लौडियास के अनुयायी हैं  ??

वास्तव में बाजार हमारे लिए खर्च को ही हमारी जीवन शैली बना देना चाहती है जबकी भारत भूमि में सदैव त्याग को महत्त्व दिया गया है |दान हमारी सबसे बड़ी शक्ति रही है और यह तो बाजार के हितों पर सबसे बड़ी चोट भी है इसी लिए शायद भारतीयता और बाजार के हितों में एक निरंतर संघर्ष भी चलता रहता है |इस समय मीडिया पर बाजार का नियंत्रण है  और उस नियंत्रण के बल पर ये बाजारी  शक्तियां भारतीयता पर प्रहार करने का प्रयास करती हैं अब हम यदि भारतीयता के बौद्धिक योद्धा है तो हमें भी उसका प्रतिकार करना ही होगा |

अब चलते चलते कुछ बातें उन लोगों के बारे में भी कर लेते हैं जो अपने को भारतीयता का ध्वजवाहक मानते हैं परन्तु मदनोत्सव की अवधारणा  को ही अस्वीकार करते हैं |हम असंतो का मुकाबला बसंतो की सहायता से ही कर सकते हैं |हमारा अनुभव है की बाजार में नकली माल तभी बिकता है जब असली माल उपलब्ध ही न हो अगर वैलेंटाइन डे ने असंत उत्सव को समाप्त करना है तो हमें लोगों को बसंत उत्सव के बारे में जानकारी देनी होगी ; यह एक ज्यादा अच्चा विकल्प होगा और तभी हम इस वैचारिक युद्ध में जीत पायेंगे |

11 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे यहाँ तो मदनोत्सव की परम्परा न जाने कब से चली आ रही है....... अब प्रेम के मायने भी बाज़ार तय करता है.....

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  2. वालेंटाइनडे को लेकर कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण और सटीक प्रश्न उठाए हैं आपने ,,,आभार...
    मगर जहां तक मुझे लगता है ऐसा नहीं है की अब केवल विदेशी त्योहारों की धूम ही ज्यादा या लम्बे समय तक सुनाई देती है। और रही मीडिया की बात तो अब वह लोग भी तो करवाचौथ जैसे ग्रहस्ती के त्योहार को खूब धूम धाम से चार दिन पहले से दिखाने लगते है। वरना पहले तो महिलाएं घर के घर मे ही यह त्यौहार माना लिया करती थी और किसी को पता भी नहीं चलता था। हाँ इतना ज़रूर है की अँग्रेजी त्यौहार की तुलना मे भारतीय त्योहारों का प्रचार कम ज़रूर होता है मगर होता तो है ही...
    बहुत आछ लिखा है आपनेविचारणीय पोस्ट ॥ समय मिले कभी तो ज़रूर आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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