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| हित्ती(कुर्दिस्तान ) सभ्यता में वृषभ |
इस सिद्धांत के समर्थक बार बार प्राचीन भारतीय संस्कृति और कुछ प्राचीन यूरोपीय संस्कृतियों के मध्य समानता के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं की आर्य नमक एक आक्रमणकारी जाति थी जो की यूरोप से आई थी जबकि इससिद्धांत के विरोधियों का कहना है की कोई बाहरी आक्रमणकारी भरत में नहीं आया था अपितु भारतवासी भारत से बहार के देशों में गए थे और अपने साथ साथ भारत का धर्म ग्रान और संस्कृति भी ले गए थे | आर्य आक्रमंसिद्धंत के कल्पकों का मानना है की आर्य आक्रमण के समय भारत के द्रविड़ो का राजा शिव था और हिन्दुओं के देवता महादेव पशुपति महादेव को ही वो लोग दद्रविनो का रजा मानते हैं और उनके अनुसार "मूल निवासी द्रविड़ों " ने अपने राजा को याद रखने के लिए ही उसकी उपासना करना प्रारंभ कर दिया था | यदि इन दोनों बातों को सत्य मान लिया जाय तो भारत के बहार के देवताओं की उपासना तो भारत में होनी चाहिए थी परन्तु पशुपति महादेव शिव की उपासना भारत के बाहर नहीं होनी चाहिए थी |
वर्त्तमान तुर्किस्तान की प्राचीन संस्कृति हित्ती थी जो की भारतीयों ने ही बसाई थी |हित्ती अर्थात खत्ती या खत्री या क्षत्रिय आज भभारत में कई स्थानों पर क्षत्रिय जाति स्वयं को खत्री कहलाती है |आज से लगभग ३७५० वर्ष पूर्व बनाये गए उनके मंदिरों में देवता भारतीय शैली में पशुओं के साथ दिखाए गए हैं | हित्त्यों का प्रथ्गम साम्राज्य आज से लगभग चार सहस्त्र वर्ष पूर्व अर्थात लगभग ओ सहस्त्र इसा पूर्व का था और यह आर्य आक्रमण सिद्धांत के कल्पकों द्वारा सुझाई गयी तिथि (एक सहस्त्र पांच सौ ईसा पूर्व ) से भी अदिक प्राचीन है | अर्थात यदि उस कल्पना की समस्त बातें सत्य होती तो भी हित्ती सभ्यता के ये मंदिर और धर्म "द्रविड़ो के रजा शिव " के जन्म से भी पूर्व के हैं | 