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रविवार, 26 जनवरी 2014

आर्य आक्रमण की कल्पना मात्र एक कुटिल कल्पना -२

bull in hitti
हित्ती(कुर्दिस्तान ) सभ्यता में वृषभ 
 हमारी पाठ्य पुस्तकों में और इतिहास की पुस्तकों के यह मिथक बार बार प्रचारित किया जाता रहा है की "आर्य  और द्रविड़ " नस्लीय शब्द है , द्रविड़ यहाँ के मूल निवासी थे और आर्य विदेशी आक्रमणकारी थे | यद्यपि यह धरना किसी भी साक्ष्य पर आधारित नहीं थी और पूर्णतयः असत्य भी सिद्ध हो चुकी है परन्तु फिर भी कुछ लोग इस बात को ही सत्य मानते रहते हैं तो एक बार पुनः तथ्यों का विश्लेषण कर लिया जाय |

इस सिद्धांत के समर्थक बार बार प्राचीन भारतीय संस्कृति और कुछ प्राचीन यूरोपीय संस्कृतियों के मध्य समानता के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं  की आर्य नमक एक आक्रमणकारी जाति थी जो की यूरोप से आई थी जबकि इससिद्धांत के विरोधियों का कहना है की कोई बाहरी आक्रमणकारी भरत में नहीं आया था अपितु भारतवासी भारत से बहार के देशों में गए थे और अपने साथ साथ भारत का धर्म ग्रान और संस्कृति भी ले गए थे | आर्य आक्रमंसिद्धंत के कल्पकों का मानना है की आर्य आक्रमण के समय भारत के द्रविड़ो का राजा शिव था और हिन्दुओं के देवता महादेव पशुपति महादेव को ही वो लोग दद्रविनो का रजा मानते हैं और उनके अनुसार "मूल निवासी द्रविड़ों " ने अपने राजा  को याद रखने के लिए  ही उसकी उपासना करना प्रारंभ कर दिया था | यदि इन दोनों बातों को सत्य मान लिया जाय तो भारत के बहार के देवताओं की उपासना तो भारत में होनी चाहिए थी परन्तु पशुपति महादेव शिव की उपासना भारत के बाहर नहीं होनी चाहिए थी  |

वर्त्तमान तुर्किस्तान की प्राचीन संस्कृति हित्ती थी जो की भारतीयों ने ही बसाई थी |हित्ती अर्थात खत्ती या खत्री या क्षत्रिय आज भभारत में कई स्थानों पर क्षत्रिय जाति स्वयं को खत्री कहलाती है |आज से लगभग ३७५० वर्ष पूर्व बनाये गए उनके मंदिरों में देवता भारतीय शैली में पशुओं के साथ दिखाए गए हैं | हित्त्यों का प्रथ्गम साम्राज्य आज से लगभग चार सहस्त्र वर्ष पूर्व अर्थात लगभग ओ सहस्त्र इसा पूर्व का था और यह आर्य आक्रमण सिद्धांत के कल्पकों द्वारा सुझाई गयी तिथि (एक सहस्त्र पांच सौ ईसा पूर्व ) से भी अदिक प्राचीन है | अर्थात यदि उस कल्पना की समस्त बातें सत्य होती तो भी हित्ती सभ्यता के ये मंदिर और धर्म "द्रविड़ो के रजा शिव " के जन्म से भी पूर्व के हैं | 

हित्ती सूर्योपासक थे | रितुदेव सबसे लोकप्रिय देवता था \ वृषभ उसका वाहन था | परशु और त्रिशुक्ल उसके शास्त्र थे |वह हित्तियों का प्रमुख युद्ध देवता भी था (बिन्कुल हिन्दू धर्म की तरह ) | अर्थात नाम ही अलग है हैं तो यह महादेव पशुपति शिव ही |

अरित्र शिव की शक्ति थी | पृथ्वी एवं आकाश की रानी और हित्ती राष्ट्र और राज्य की संरक्षिका थी | हित्ती उसे जगत्माता के रूप में देखते थे | सिंह उसना वाहन  था | वह दुर्गारूप थीं और "बोघज कुई"  में उसका मंदिर था |उसी के अन्य नाम  सिबेले या शिबिली था |
हित्ती सभ्यता
हित्ती सभ्यता 

इस प्रकार हम देखते हैं की कथित "आर्य आक्रमण " के बहुत पहले की शिव- शक्ति का अस्तित्व था इसलिए शिव कोई  राजा  नही था अपितु त्रिदेवों में से एक जगत के आधार युद्ध कला के जनक और इस जगत का संघार करने वाले महादेव हैं | आर्य आक्रमण का सिद्धांत मात्र एक कुटिल कल्पना है जो की भर्त्यूं में हीन भावना भरने के लिए की गयी है |

सन्दर्भ : कृण्वन्तो विन्श्वर्यम (शरद हेबालकर)ISBN 978-81-907895-3-0 

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपकी मान्यता से सहमत हूं। इस संबंध में विचार विमर्श करते समय जैन शास्ऱों का भी संदर्भ लेना चाहिए। योरपीय इतिहासकारों की मान्यता को ध्वस्त करने के लिए समग्र प्रयासों की जरूरत है। भारतवर्ष का इतिहास अब नए सिरे से और नए दृष्टिकोण से लिखा जाना चाहिए। ऐंग्लोसैक्सन सभ्यताओं ने दुनिया की हर प्राचीन सभ्यता को नष्ट किया है, वह चाहे अमेरिका के मूल निवासी हों या अफ्रीका उपमहाद्वीप के मूल निवासी हों। उन्होंने सभी को कुचला है और अपनी मान्यताएं थोपी हैं। हमारे देश में रोमीला थापर जैसी कथित इतिहासकार भी हैं जो राम के अस्तित्व को ही कपोलकल्पना मानती हैं।

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  2. मैं आपकी मान्यता से सहमत हूं। इस संबंध में विचार विमर्श करते समय जैन शास्ऱों का भी संदर्भ लेना चाहिए। योरपीय इतिहासकारों की मान्यता को ध्वस्त करने के लिए समग्र प्रयासों की जरूरत है। भारतवर्ष का इतिहास अब नए सिरे से और नए दृष्टिकोण से लिखा जाना चाहिए। ऐंग्लोसैक्सन सभ्यताओं ने दुनिया की हर प्राचीन सभ्यता को नष्ट किया है, वह चाहे अमेरिका के मूल निवासी हों या अफ्रीका उपमहाद्वीप के मूल निवासी हों। उन्होंने सभी को कुचला है और अपनी मान्यताएं थोपी हैं। हमारे देश में रोमीला थापर जैसी कथित इतिहासकार भी हैं जो राम के अस्तित्व को ही कपोलकल्पना मानती हैं।

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