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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

मजहब हमें सिखाता है केवल बैर रखना

सबसे पहले तो ये समझ लेना चाहिए की धर्म और मजहब लग अलग हैं और जब आप धम्र और मजहब में अंतर समझ जायेंगे तो आप को ये भी पता चल जाएगा की मजहब बैर करना ही सिखाता है | केवल बैर ही नहीं जो भी मजहब के बाहर हैं उनकी हत्याएं करना और और उन पर हर तरह के अत्याचार करना सिखाता है मजहब | धर्म की परिभाषा दी गयी है "धारयति इति धर्मः" अर्थात जो धारण करने के योग्य हो वो धर्म  है जबकी मजहब कहता है की जो कुरआन और पैगम्बर में विश्वास रखता हो वो ही मजहब है और बाकी सब कुफ्र और काफिरों की हत्या का सीधा आदेश है मजहब का तो ; मजहब तो बैर करना ही सिखाता है |

इस्लाम का मूल ही गैर इस्लामिक लोगों से टकराव है | मुस्लिम अल्लाह की उपासना करते हैं और अल्लाह शब्द अरबी भाषा के "अल - इलाही"शब्द से बना है | अरबी भाषा में "इलाही" का अर्थ होता है देवी और इस्लाम के उदार के समय अरब के सभी कबीलों की अपनी अपनी अराध्य देवियाँ थीं परन्तु मुहम्मद ने अपनी देवी को "अल इलाही" कहना शुरू कर दिया | अल का अर्थ होता एह आंग्लभाषा का THE या हिंदी का "एकमात्र" अर्थात इस्लाम का उधर ही है किसी भी दुसरे की आस्थाओं को मान्यता न देना तो आप स्वयं ही सोचिये की मजहब बैर रखना सिखाएगा या नहीं ?


इस्लाम में "क़ुरबानी" का चलन है परन्तु अन्य आस्थाओं की तरह यह सर्वशक्तिमान को उपहार नहीं है अपितु यह गैर मुस्लिमों में भय उत्पन्न करने का तरीका है | पैगम्बर ने स्वयं कहा है "तुम ऊँटों के गले में छेद कर दो और उससे खून को बहने दो ; ऐसा करने ऊंट की मृत्यु कष्ट के साथ होगी और ये देख कर काफिरों के मन के तुम्हारी ताकत की धाक जम जायेगी "| जिनका एक प्रमुख पर्व ही अन्य आस्था वालों के ह्रदय में भय उत्पन्न करने के लिए हो उनसे क्या अपेक्षा ?

इस्लाम किसी आस्था का नाम नहीं है अपितु इस्लाम केवल अरब राष्ट्रवाद है और शायद एक अपराधियों का दल भी और इस दल का प्रथम मन्त्र है केवल एक अरब राष्ट्रवाद के प्रति ही आस्था रखना इसके बार किसी भी चेज पर किसी तरह की कोई आस्था नहीं और शायद इसीलिए इतिहास ने यह सिद्ध किया है की मुस्लिमों की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती है या यूँ कहें मुस्लिमों के केवल एक राष्ट्रीयता होती है इस्लाम अर्थात उनका मजहब और वो भी आक्रामक राष्ट्रीयता तो ऐसा मजहब हमें क्या सिखाएगा आप स्वयं ही इसका उत्तर खोजें |

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